ऐसा मैंने नहीं चाहा था,
चलते-चलते झुक जायें
मन का आलोक मिट जाये,
तन का रोग बढ़ जाये
ऐसा मैंने नहीं चाहा था।
राह हमारी मिट जाये
दीप जग के बुझ जायें,
नीर नदी का घट जाये
स्नेह वृक्ष कट जाये,
ऐसा मैंने नहीं चाहा था।
कुटिल बुद्धि जग जाये
गंध मदिरा की आ जाये,
वेदना लहर बन जाये
भूख किसी को तड़पाये,
ऐसा मैंने नहीं चाहा था।
*महेश रौतेला