सुदंर रचना ,प्रकृति ....
समय पर न संभले तो रोते रह जाओगे
प्रकृति रुठी तो कहीं के न रह पाओगे ।।
बडे अदब से रात दिन पेड काटते हो ।
प्रकृति की हरितिमा को नष्ट करते हो ।।
बडा महंगा होगा ये सौदा जरा समझो ।
प्रकृति नहीं तो हम भी नहीं रहेगें ।।
ये प्रकृति के सुदंर वरदान हमारे लिए हैं हमें धूप ,छाया ,हवा दे रहे हैं ।।
इनके अमूल्य सेवा की जरा तो कर्द करो ।
नदी ,कूप ,तालाब जब सुख जायेगें ।।
पानी तुम फिर कहाँ से पा सकोगे ।
प्रकृति हमें बिना मूल्य हमको देती ।।
हम ना समझ बन उसको व्यर्थ बहाते ।
आज चारो ओर हाहाकार मच रहा हैं ।।
कही पानी ,स्वच्छ वातावरण नहीं मिल रहा हैं ।
तरसते है लोग शुद्ध वायु ,पानी के लिए भी ।।
विकास के नाम पर हमने हजारों पेडो को काटा ।
प्रदुषण को हमने अपने हाथों से बढाया हैं ।।
अभी संभलें नहीं तो बाद में पछताना पडेगा ।
प्रकृति रुठी तो जीवन कुर्बान करना पडेगा ।।
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