सुदंर कविता ..
शब्द .वृद्धाश्रम ।
तुझे नौ नौ महीना कोख में पाला हैं ।
तेरे लिए रातों की नीदें कुर्बान की हैं ।।
तुझे अंगुली पकड कर चलना सिखाया हैं ।
तेरे लिए देवी देवताओं की कयी मन्नतें की हैं ।।
तेरे लिए पलक पावडे बिछा दिए हैं ।
बडा होकर तु हमारी आंखों का तारा होगा ।।
हमारे बुढापे की लाठी का सहारा हो सकेगा ।
वही आँखों का तारा आज हमें वृद्धाश्रम छोडने चला हैं ।।
हम से क्या भुल हो गयी तेरे पालन पोषण में मालुम नही हैं ।
पराई जाया आते ही तेरी आँखे क्यूं फिर गयी है हमसे ।।
तूजे जरा भी लाज नहीं आती हैं अपने कृत्य पर ।
आज तू बुढापे का सहारा हमें ही आँखें दिखा रहा है ।।
अब तुझसे फिर भेट हो सकेगी क्या मेरे लाल इस जन्म में कभी ।
माफ कर देना हमें तु अभागे समझ कर ।।
तुने यह कोन से जन्म का पाप का बदला हमसे लिया हैं ।
हमें क्या पता था कि हमारी आँखों का तारा भी बेगाना हो जायेगा ।।
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