संत कबीर दास जी का दोहा आज के विषय "नरम"के संदर्भ में याद आ रहा है "बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पिंड खजूर पंछी को छाया नही फल लागे अति दूर" आज के परिवेश के सभी तो नही पर इस जमाने की भागदौड़ में अपनापन,सदाचार,मधुर स्वभाव लुप्त सा होता जा रहा है एक समय अपना भारत देश आपसी मधुर्यपन,सदाचार,आपसी सदभाव, मित्रता,भाईचारा,के लिऐ विश्वविख्यात था । आज उसमें कमी आयी है आज के युग मे कोई किसी की निस्वार्थ मदद नही करता है ।याचिकर्ता मानव से उसका व्यवहार सरल नही होता किसी दूसरे के दुख में शामिल होने से परहेश करता है किसी की मदद करने पर उस पर एहसान की टोकरी रखना उसका स्वभाव से बन गया है दिल से नरम रहना मदद करना ये शब्द इंसानी स्वभाव से लुप्त होते जा रहे है, इसका शायद मेरे मत से प्रमुख कारण सयुक्त परिवार का टूटकर एकल परिवार का होना है जिसमे बस हम दो हमारे दो माँ पिता भाई बहन ताया ताई से कोई मतलब ही नही रहा है ।
#नरम