एक बार फिर भरत, नव प्रारंभ होनी चाहिए
बन्द कान भी खुलें यूँ आवाज़ होनी चाहिए
समय की मांग कह रही , ख़ामोशी को तोड़ दें
हो फिर सिंह गर्जना , फिर हुँकार होनी चाहिए
खोले पर,उड़ान लें, नये क्षितिज की खोज हो
एक बार फिर विश्व में, जयकार होनी चाहिए
तमस काटने को ये गिरता मोम अब काफी नहीं
दिलों में ज्वाला , हाथों में मशाल होनी चाहिए
#प्रारंभ