दिखावट
मुसकराते हौठौ पे गम छुपाते
भिड़ से भरे इस शहर में
हस्ते चेहरे पे नमी छुपाते
दिखावट कि इस इस दुनिया में
रेह गए हम अपना असली चेहरा छुपाते
न जाने कैसे
भीड़ में भी तन्हा सा रेहता हु
अपनो में भी अपनो को ढूंढ ता हु
न जाने कहाँ
लुप्त हो गए वो सारे
इस दिखावट के दौर में
अपनो को छोड़ अंजानो से कैसे जुड़ गए सारे
अब तो आदत सी हो गयी है
झूटी तस्वीर दिखाने की
भूला हु चेहरा खुद का
नाम तक याद नही
जो हस्ता था कभी
ऐसी शिकस्त मिली है दिखावट की
मुस्कराते होठों पे
हँसी ढूंढ त हु आज भी
- कुमार