Hindi Quote in Poem by Yasho Vardhan Ojha

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१.लाल पलाश

कितने वर्षों के बाद आज
फिर धवल दिखा आकाश,
साफ हवा में दिखा
दूर वह फूला लाल पलाश।

बिना धुएं में लिपटी- सिमटी,
आम - बौर की महक आ रही,
वाहन गायब, शोर थमा है,
वीरां सड़कें, अजब समां है,
गौरइया की चिर-चिर, चिर-चिर,
कोयल खुश हो खूब गा रही।
मौसम ने भी करवट ले ली,
सूर्य फेंकते प्रखर प्रकाश।

दूर वह फूला लाल पलाश…

दिन भर तो कमरों में काटा,
गजब रात का है सन्नाटा,
आसमान बदला-बदला है,
चांद खेलने को मचला है,
सारे तारे साथ हो लिये,
जाने कौन खेल अगला है,
कुछ तो बात हुई है जग में,
प्रकृति का यह रूप भला है।
सब कुछ है निस्तब्ध मगर,बस
मनुज है नहीं मनुज के पास।

दूर वह फूला लाल पलाश…

सब कुछ खा लें, सब कुछ पा लें
बहुत जमा है, और जमा लें।
लालसा ऐसी हुई अदम्य,
पाप सब करने लगे अक्षम्य,
तो, प्रकृति से नहीं हुआ बर्दाश्त,
जननी से बोली सुनिए मात,
मानवों का करिये कुछ उपचार,
नहीं तो अब डूबा संसार।
एक अदृश्य विषाणु ने,
जब मां से पाया आदेश,
कांपते दीख रहे सब देश।
अब भी अगर नहीं सुधरे,
तो निश्चय ही है महाविनाश।

कहां फूलेगा लाल पलाश?

--यशो वर्धन ओझा

२.
हमारे बीच ये जो दूरी है,
बहुत जरूरी है।
जरूरी है कि,
ट्रेन की पटरियों सा,
समान अंतर हो लगातार,
जुड़े भी रहें स्लीपरों से,
जो, हमारे बीच आएं बार – बार।
हमें दूरी का दुःख,
हमेशा यूं ही सहना है,
अपने डिब्बों को आख़िर,
हमीं पे रहना है,
दौड़ें वे ख़ुशी से दाएं – बाएं,
कुछ को ले के आएं
औेर, कुछ को ले भी जाएं।
यही ठीक है कि,
हम उनका और वे,
सभी का भार उठाएं।

-- यशो वर्धन ओझा।

Hindi Poem by Yasho Vardhan Ojha : 111381729
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