इंसान का जन्म यानी मां बाप की स्वर्गीय आनंद की पराकाष्ठा,बचपन की परवरिश यानी जीवन दायकों का अपने भविष्य की चिंताओं से पार पाने की कोशिश, इंसान का विवाह यानी अपने वंशवृद्धि की मंगल कामना और अपनी जरावस्था की खुशनुमा शाम ढलने की प्रतीक्षा। इंसान सारी जिंदगी दूसरों के लिए ही जीता है, जब भी उसमें निजता का भाव आता है, तभी वह अस्तित्व विहीन हो जाता है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए।
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