घूंघट की आड़ से
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कल ही अपने खेतों में जाना हुआ। एक पारिवारिक उत्सव में सम्मिलित होने के लिए। कुछ बड़े बुजुर्ग भी थे तो थोड़ा घूंघट भी करना ही था कि तभी मन में मन्थन हमें मथने लगा कि कभी कभी पर्दा करते हैं तो निभा लेते हैं अगर रोज करना पड़े तो नानी याद आये। वैसे जब नई शादी हुई थी तो रोज करते भी थे।
तेज चलने की आदत, रोज ही कहीं न कहीं अटक कर गिरते पड़ते रहते। (अक्सर चोट भी खायी ही है हमने)
मन ही मन मुगलों को बुरा बुरा भी कह डाला।
कारण बस एक कि घूंघट हमारे देश का चलन कभी नही रहा। यह पर्दा प्रथा... मुगलों की जबरन थोपी हुई प्रथा है।
सुंदर हिन्दू नारियों को जबरन अपना बनाने के लिए उनका बलात्कार तक किया जाता और बस उनसे बचने के लिए महिलाओं ने अपना मुँह ढकना आरम्भ कर दिया।
मुगल गए अंग्रेज आये और अंग्रेजों को भी जाना पड़ा, बस रह गयी कुछ कुरीतियाँ प्रथाएं बनकर जिनको बिना सोचे समझे निभाते जा रहे हैं जबकि समय की माँग को समझना भी तो जरूरी है।
विनय...दिल से बस यूँ ही