पलायन
******
देश के विभिन्न प्रदेशों से मजदूरों के पलायन से स्थिति और बदतर होती जा रही है। उनके भोजन और रात्रि प्रवास के साथ महामारी का भयानक साया भी मंडरा रहा है। अभी स्टार न्यूज़ पर रुबिका को ठेकेदारों की असवेंदनशीलता पर बोलते सुना तो खुद को रोक नही पाई।
आखिर ऐसी स्थिति के कारक कौन लोग है?
बहुत करीब से देखा है उन परिस्थियों को जिनको लिख रही हूँ।
एक व्यक्ति रोजी रोटी कमाने दिल्ली आता है 4 पैसे कमाने भी लगता है। धीरे धीरे वह पैसे जोड़कर और काम की बारीकियां समझ कर ठेकेदार बन जाता है। फिर अपने ही भाई बन्धुओं को दिहाड़ी मजदूरी के लिए बुला लेता है।
इस तरह दिल्ली में अधिकतर ठेकेदार भी बिहार और उत्तर प्रदेश से और मजदूर भी वहीं से।
बाहरी ठेकेदारों में सफलता का प्रतिशत मात्र 2% होता है बाकी ठेकेदारी बस दाल रोटी ही चला पाती है।
उन 2 प्रतिशत की चमक को देखकर गाँव के और लोग मजदूरी करने गांव छोड़कर शहर भाग आते हैं।
दिल्ली में सरकारी जगह पर झुग्गी डालकर रहना आरम्भ करते हैं फिर ये तबका एक बड़ा वोट बैंक बन जाता है जिसके चलते इन्हें बिजली, पानी जैसी सुविधाएं मुफ्त मिलती हैं।
यही वह लोग हैं जो दिल्ली की सरकार बनाने मे अहम भूमिका निभाते हैं।
अब मुसीबत के समय पलायन करने वाले दिहाड़ी मजदूरों की बदतर हालात के जिम्मेदार उन्हीं के भाई बन्धु हैं ना कि कोई और।
व्यथित हम भी हैं लेकिन अगर यह लोग नकली चमक की मृगतृष्णा छोड़ कर अपने गाँव मे ही कोई काम करते तो और 4 लोगो को रोजगार देते।
विशेष
****** हर राज्य के #मुख्यमंत्रियों से करबद्ध प्रार्थना है कि प्रत्येक नागरिक की रोजी रोटी का ऐसे ख्याल रखे कि किसी को अपनी जन्मभूमि अपना गांव छोड़कर जाना ही न पड़े।
विनय...दिल से बस यूँ ही