’यदि हमारी सारी इच्छाऐं बिना किसी बाधा के पूरी होती रहें तो फिर हम मनुष्य काहे के ठहरे। मनुष्य जन्म से अपूर्णता का प्रतीक बना आता है। यह अपूर्णता ही हमें जीवित रहने की शक्ति देती है। पर हमारा मन रात-दिन अपूर्णता को सहलाता रहता है। वह उपचेतना में घुसकर ख्याली पुलाव पकाता है और हम वहीं के वहीं रह जाते हैं। चेतना जो अंतः में होती है, उसकी परवाह हम नहीं करते।
........ भूपेन्द्र कुमार दवे