भावनाओं का कत्ल हो रहा
मानवता दूर खड़ी झांक रही।
संवेदनाएं रही ही नहीं
सरसता धूल फांक रही।।
नासमझी करे नाज खुद पर
निर्दयता का भी कद बढ़ गया।
कोई ना हमदर्द किसी का
गरुर सबके सर चढ़ गया।
भावनाओं से खेलना आजकल
हर किसी का पेशा हो गया।
मन की अपनी कहना किसी को
दीवारों को बतलाने जैसा हो गया।।
पराई पीर पर मुस्कुरातें है
बैठे हैं कैसे-कैसे लोग यहाँ।
कुछ मगर के आंसू रोते है
रचाते नित नये ढोंग यहाँ ।।
मरी संवेदनाएं सबकी
किसके आगे बिलख रहे हो।
कोई नहीं तुम्हें पढ़ने वाला
किसके लिए 'ओमदीप' लिख रहे हो।।
✍️✍️ओमदीप वर्मा
बीकानेर (राज.)