--शुरुआत--
आज,
खास इक बात हुई है,
अलट-पलट औ',
सरक-सरक कर,
आगे बढ़ना,
पीछे छोड़,
सहम-सहम कर
दो पैरों पर
चलने की
शरुआत हुई है।
आज,
खास इक बात हुई है....
कदम काँपते
मगर नापते,
बस माता तक की दूरी
परम लक्ष्य है वही
उसे पाना है
उनकी मजबूरी
मृग-शावक सी
सहज चपलता
भला उसे कैसे आती
नन्हे पैरौं की पिंडलियाँ,
शीघ्र शक्ति कैसे पातीं
डगमग चरणों के
नूपुर से मीठी सी
आवाज़ हुई है
आज खास इक....
विहग -शिशु
जैसे तोले पंख
किंतु मन प्रतिपल
रहे सशंक
गिरा तो
धरा का आलिंगन
उड़ा तो
चूमा उच्च गगन
दो नयनों से
आज क्षितिज का
सीधा हो दर्शन।
उसके हर पग पर
स्वजनों की स्नेह-सिक्त
बरसात हुई है।
आज खास इक बात हुई है।।