आज एक चीज प्रत्यक्ष समझ मे आई जितने भी अध्यात्म के ऊपर बाते करने वाले है... उन सभी का अध्यात्म से कोई लेना देना नही है... केवल बाते है...
अध्यात्म जिया जाता है, ये मनन-मंथन का विषय है, स्वयं से स्वयं की लड़ाई है, कोई क्रिया नही ना ही कोई वस्तु जिसे परोसा जाये..
ना ही कोई ज्ञान है... जो दूसरों पर लादा जाय, ये बस अनुभूतियों पर आधारित है... स्वयं को जानने की प्रक्रिया... मानवीय-सागर को शोक-रहित व बिना संकट तैर कर पार कर जाने की एक कला, इसमे एक बार यदि आप स्वयं को थोड़ा भी जान गए या आपको अपनी आत्मा के दर्शन/अनुभूति हो गई, तो फिर आप रुक नही सकते , किसी के लिए भी नही... खैर, मैं कोई ज्ञान देने नही आया हूँ और ना ही मैं यहां ज्ञान देना ही चाहता हूँ, मैं यहां बस अपने लिए लिखता हूँ, लेकिन इन सब पर भी लिखना जरूरी हो जाता है... जब कोई मूढ़ी व्यक्ति आत्मा की प्रसन्नता के लिए अध्यात्म चुनने को कहता है, उन मूर्खो से मैं बस इतना ही कहूंगा की बालक! आत्मा केवल दर्शक है, साक्षी है आपके हर गुण-दोष या अवस्था का, वो गुणों का सृजन नही करती और ना ही भोगती है, आत्मा की प्रसन्नता जैसी कोई चीज नही होती। वो तुम्हारी बुद्धि है जो प्रसन्न होती है प्रीति, आनन्द, सुख, चित्त की शांति, दाह, शोक, संताप, लोभ, लिप्सा, अपूर्णता, असहनशीलता, राग, मोह प्रमाद, दरिद्रता इत्यादि का सृजन तुम्हारी बुद्धि ही करती है, ये समस्त गुण जड़ है आत्मा सिर्फ इन्हें जानती है, वो साक्षी मात्र है... जिस दिन तुम इस भेद को समझ जाओगे उस दिन मेरे पास आना ज्ञान देने अध्यात्म का... मैं तुम्हारे चरणों मे बैठकर सुनूंगा तुम्हे...
लेकिन तुम तो स्वयं-भू हो, तुम्हे अध्यात्म की घुट्टी पिलाने वालो ने तो भेद भी नही बताया, थोड़ा सा शास्त्र ही पढ़ लेते तो रुद्र और शिव का भेद ही पता चल जाता...
लेकिन तुम तो स्वयम्भू हो... खैर! कोई बात नही..