I can't afford to be in competition. This is merely for expression of view.
गुप्तजी की कविता के कुछ अंश -
" नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो , कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिस में यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो .....
सम्भलो कि सुयोग्य न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो ......."
#काम
from USA