जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं ,
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति ।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं ,
सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ॥
भावार्थ :
अच्छी संगति जीवन का आधार हैं
अगर अच्छे मित्र साथ हैं तो
मुर्ख भी ज्ञानी बन जाता हैं
झूठ बोलने वाला सच बोलने लगता हैं,
अच्छी संगति से मान प्रतिष्ठा बढ़ती हैं
पापी दोषमुक्त हो जाता हैं ।
मिजाज खुश रहने लगता हैं
और यश सभी दिशाओं में फैलता हैं,
मनुष्य का कौन सा भला नहीं होता ।