#साथी
किन शब्दों से संबोध करूं, केवल अब इसका बोध करूं
तुम शब्द मात्र ही हो मेरे इसके अतिरिक्त नही कुछ भी , भावों में तुम्हें पिरोया था. मन वाणी से, धोया था एक पुष्प समझ तुमको मैने मन्दिर की वेदी में रख्खा,एक परम वेदना दी तुमने , एक चरम हर्ष तक पहुँचाया जो केवल था, भरम मन का मन ने ही मन को भरमाया, तुम साथ नही न हो "साथी" यह सत्य, रहा न कुछ बाकी.