सुदंर कविता ...
जिदंगी के लम्हें चुरा कर ,बटुए में रखता रहा ।
फुरसत के पलों में खरचुंगा ,बस यही सोचता रहा ।।
जीवन को बुरे कामों में ,लगातार लगाता रहा ।
कभी दुसरों के आंसू ,आँख के न पौछता रहा ।।
हमेशा दुसरों को ,असह्य् दुःख दर्द देता रहा ।
कभी अपने तन को ,दुसरों के लिए न सजाता रहा ।।
हमेशा आवारागर्दी में ,जीवन बीताता रहा ।
फिसल गयी खुशियाँ ,मैं हाथ मलता देखता रहा ।।
जब संभला तो ,जीवन साथ मेरा छोड रहा ।
अभी उन पलो के ,बारे में नही सोचता रहा ।।
हाय उम्र बित गयी ,अब मैं पछताता ही रहा ।
सुख के पलों को ,अपने हाथो लुटाता ही रहा ।।
जिदंगी में किसी के ,काम कभी नही आया ।
यह सोच सोच कर ,अब पछताता ही रहा ।।
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