हे कृष्ण
कैसे अहसास हो-
स्नेह के शिखर का
भक्ति के सारांश का,
कैसे ऊँच-नीच से
विदा ली जाय,
कब गायों से
स्नेह हो जाय,
कब बाँसुरी की धुन से
मोक्ष मिल जाय,
कब पांचाली
केशों को खुला छोड़ दे,
कब युधिष्ठिर महाराज
जुए के पासे फेंकें,
कब महाभारत हो,
कब भीम की गदा
जंघाओं को तोड़ दे,
कब परीक्षित का
वृत्तांत आ जाय,
कब तुम्हारी अंगुली पर
चक्र घूमने लग जाय,
कब पांडव सिंहासन छोड़
हिमालय पर आ जाएं,
हे कृष्ण
कैसे घटनाओं को पढ़़ा जाय।
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**महेश रौतेला