मेरे मन में तुम बजते हो
शक्ति रूप में तुम रहते हो,
सत्यार्थ सदा तुम चलते हो
दिव्य स्वरूप में तुम मिलते हो।
कभी तुम्हें मैं शिव कहता हूँ
कभी तुम्हें मैं मन कहता हूँ,
कभी तुम्हारा जप करता हूँ
कभी जग में तप करता हूँ।
त्रिनेत्र हो देख रहे हो
किसी साधना में चुप बैठे हो,
शिव की सबको प्यास जगी है
तुम विष लेकर शान्त बने हो।
**महेश रौतेला