Hindi Quote in Blog by TEJ VEER SINGH

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सोच अपनी अपनी - लघुकथा -

"आइये जी, आपका खाना लग गया।"

सत्तर वर्षीय विनोद जी धीमे कदमों से आकर डायनिंग टेबल पर बैठ गये।

"आज आपकी मन पसंद दाल बनी है।"

विनोद जी ने प्लेट लेकर कटोरी में दो चम्मच दाल ही डाली थी कि वीना जी ने टोक दिया,"थोड़ी सी दाल मोनू के लिये भी छोड़ देना। उसे भी यह दाल बहुत पसंद है।आज लेट हो गया।वैसे रोजाना डिनर तक आ जाता था।"

विनोद जी ने अपनी कटोरी की दाल डोंगे में वापस उलट दी।

"अरे आपने यह क्या किया? थोड़ी सी तो ले लो।मोनू सारी थोड़ी खायेगा।"

"अब क्या पता कितनी खायेगा। उसे दाल चावल पसंद हैं तो दाल ज्यादा चाहिये। मैं तो रात को केवल दो ही चपाती खाता हूं। सब्ज़ी से खालूंगा।"

"आजकल आप छोटी छोटी सी बात का बुरा मान जाते हो।"

"अरे नहीं वीना। इसमें बुरा क्या मानना।"

"आप ना बहुत बदल गये हो।"

"उम्र और समय के साथ सभी बदल जाते हैं।"

"कैसी बात करते हो? मैं तो बिलकुल भी नहीं बदली।"

"ऐसा तुम्हें लगता है। जबकि हक़ीक़त यह है कि नारी जाति में जीवन भर बदलाव आते हैं।यह उसका कुदरती स्वभाव है ।"

"ऐसा कैसे कह सकते हो आप?"

"स्त्री को प्रकृति ने स्वभाव से ही परिजीविता बनाया है।"

"क्या मतलब है इसका? मैं कुछ समझी नहीं।"

"देखो, नारी जन्म से ही अपने परिजनों पर आश्रित रहती आई है। बचपन में उसका झुकाव पिता की ओर होता है।युवा होने पर उसकी संपूर्ण निष्ठा पति की तरफ होती है।लेकिन बुढ़ापे में उसे पुत्र अधिक प्रिय होते है।क्योंकि स्त्री सदा ही सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा के सहारे अपने परिजनों में तलाशती है।जो कि उम्र के दौर के साथ बदलते रहते हैं|"

तभी मोनू के आने से उनके वार्तालाप में व्यवधान आ गया।

"आजा बेटा, खाना खाले, हम लोग तेरा ही इंतज़ार कर रहे थे।"

"नहीं माँ, आप लोग खालो। मैं बाहर से खाकर आया हूं।"

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