14 फरवरी
**********
निशब्द हूँ मैं आज,
न जुबान कुछ हैं बोलती,
कहाँ गई मानवता,
तू हैं कहाँ डोलती,
आतंक इतना बढ़ गया,
अब सहा जाए ना,
मौन भी अब हमसे,
रहा जाए ना,
छलनी हो गया है सीना,
आज ये देख कर,
माँ के सपूतों को यू,
लहूलुहान देख कर।
14 फरवरी का दिन जब आता है
माँ के सपूतों की याद दिलाता है,
शत शत नमन करें उन वीरों को,
सदा याद रखेगें उनकी तस्वीरों को,
शहादत उनकी हम न भूलेगें,
दुश्मनों से इसका बदला हम जरूर लेगें
बस बहुत हो चुकी
अब दोस्ती की बातें,
दोस्तों के पीट पर,
हम गोली नहीं चलाते
बहुत कुछ है लिखना,
शब्द कम पड़ गये
अब मेरी कलम,
खामोश कैसे रहे,
याद कर के दिन वो आज
मेरी कलम भी रो पड़ी
कविता की ये पंक्तियाँ,
फिर भी कम पड़ रहीं।
उमा वैष्णव
स्वरचित और मौलिक