समय:
समय तू महान है,
न जन्म तेरा, न मृत्यु तेरी
ये खुला ब्रह्मांड तेरा,
साथ में भी, संग में भी
पुण्य में भी,पाप में भी,
समय तू महान है।
फूल में ,फसल में
बचपन में,यौवन में,
गीत की पंक्ति में
समय तू महान है।
प्राण है,पाषण है
वसंत भी तू दिख रहा है,
स्वतः यात्रा कर रहा है
मेघ सा तू छा रहा है।
प्यार से मिल रहा है
युद्ध में डट रहा है।
तू किसी आघात में है
फिर किसी प्रतिघात में है,
तू हमारी सभ्यता में घुला हुआ निनाद है।
कान सबके ऐंठता तू
वरिष्ठता को आँकता तू,
घराट सा नचा नचा के
स्वर में बैठा हुआ तू।
पहाड़ों में चढ़ा हुआ
तीर्थों में आया हुआ,
उदारता में बहा हुआ तू
विकट होकर चला हुआ तू।
अंधकार नहीं- नहीं
तू हमारा प्रकाश ठैरा,
जन्म भी ,मृत्यु भी
तू सदा निष्पक्ष ठैरा।
* महेश रौतेला