मूरत
उसने दुनिया की हर वह चीज़ उसके कदमों में डाल दी, जिसकी वह तलबगार थी। उसने प्रकृति के हर उस अनमोल उपहार से उसे नवाजा, जिससे उसकी सूरत और सीरत दोनों निखरती गयी।
उसके हृदय में प्रेम का सागर हिलोरे मारता था। फूलों की कोमलता उसके अंग प्रत्यंग के साथ स्वभाव में भी झलकती थी। आकाश की व्यापकता और धरती की सहिष्णुता उसके प्रमुख श्रृंगार थे। उसकी माँग में चाँद सितारे टांक कर, स्याह रातों से सुरमा उधार लेकर, भोर की किरण से ताज़गी और प्रकृति से हर श्रृंगार लेकर उसके चेहरे पर सजाकर वह उसे सुंदरता की प्रतिमूर्ति में ढालकर अपनी हथेलियों पर रखता था। वह भी खुश थी.. उसे जरूरत भी क्या थी अपने बारे में सोचने की... वह तो उसकी हर जरूरत पूरी कर खुश होती थी। दोनों संतुष्ट थे क्योंकि वह सिर्फ दिल से सोचती थी।
फिर आज क्या हुआ...? इतनी सुंदर मूर्ति खंडित हो गयी... क्यों..??
क्योंकि मूर्ति जीवंत हो गयी थी और उसने दिमाग से सोचना शुरू कर दिया था....!
©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक