Hindi Quote in Poem by कुमार संदीप

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शीर्षक-बेटी हूँ तो क्या हुआ?

चाहती हूँ बहुत कुछ करना,कुछ बेहतरीन करना 
चाहती हूँ इक दिन कुछ ऐसा करुं 
कि आने वाले कई वर्ष तक मैं सभी के हृदयतल पटल पर अंकित रहूं 
चाहती हूँ कि न बंधी रहूं बेवजह की बातों से 
मैं जीना चाहती हूँ ख़ुद की मर्जी से 
मैं सबसे कुछ अलग करना चाहती हूँ 
पर हर बार मेरे पंख काट दिये जाते हैं 
पुरुष भूल जाते हैं इंसानियत 
उनके अंदर छिपी रहती है हैवानियत 
और कर देते हैं शर्मसार मानवता को 
जन्म लेने से पूर्व ही मेरी साँसें रोक दी जाती है 
जन्म ले भी लेती हूँ धरा पर तो 
वक्त-वक्त पर हर तरह से हैवानों द्वारा मुझे नोचा जाता है 
मैं जब चलती हूँ पथ पर, 
इक डर सा रहता है मन में 
कि कहीं कोई हैवान न मिल जाए पथ पर 
न जाने कई प्रश्न हिलोरे मारते रहते हैं अंतस में 
फिर ख़ुद को सँभालती हूँ 
मैं आत्मविश्वास बढ़ाती हूँ 
और लेती हूँ शपथ कि 
डर का सामना डरकर नहीं 
मैं डर का सामना डटकर करूँगी 
अब मैं नहीं शोषण का शिकार बनूंगी 
मैं दुराचारियों को सबक सिखाऊँगी 
हाँ, मैं अब ख़ुद को कमजोर नहीं समझूँगी किसी मोड़ पर 
मैं मुश्किलों को मात दूँगी 
हाँ,मैं खुलकर जीवन जिऊँगी 
बेटी हूँ तो क्या हुआ 
मैं भी बहुत कुछ सकती हूँ। 

©कुमार संदीप
स्वरचित
ग्राम-सिमरा 
पोस्ट-श्री कान्त
थाना-पिअर
जिला-मुजफ्फरपुर

Hindi Poem by कुमार संदीप : 111334923
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