दूषित जल
एक दिन सहसा गंगा नदी व्याकुल हो उठी! मछलियाँ और अन्य जलीय जीव भी घबरा गए।असंख्य मछलियों में एक मछली ने नदी से व्याकुलता का कारण पूछा।गंगा नदी ने कहा.."मछली रानी तू नहीं समझेगी मेरी पीड़ा। नदियों में स्नान कर जो इंसान खुद को निर्मल समझते हैं, वही इंसान नदी में मृत अवशेष व अवांछनीय पदार्थों को प्रवाहित कर जल को दूषित कर रहे हैं। ऐसे में मैं व्याकुल न होऊं तो क्या करूं?आखिर कौन समझेगा मेरी पीड़ा?कहाँ मांगती हूँ इंसानों से कुछ, बस! थोडा-सा देखरेख के सिवाय। न करें कोई दुषित मेरे जल को,बस.. इतना ही न! पर इंसानों को तो मेरी तकलीफों से मतलब ही नहीं है। अब तू ही बता मछली,मैं क्या करूं?" इन बातों को कहते ही नदी के शुष्क नयन सजल हो गए। मछली के आँखों से भी आँसू की धाराएं बहने लगी।मछली और नदी की आँखों के आँसू नदी में फिर से मिल गए। नदी पुनः शांत हो गई,पर.. अब शायद ही कोई नदियों की रक्षा के विषय में चिंतित हो!!!
©कुमार संदीप
मौलिक, स्वरचित
ग्राम-सिमरा
शहर-मुजफ्फरपुर
राज्य-बिहार
पिनकोड-843115