सेवाधर्म
श्री राजेन्द्र पाल अग्रवाल 86 वर्ष की अवस्था में भी पूर्णतः सक्रिय रहते हुए अपने व्यवसाय को संभाल रहे है और इससे उन्हें संतोष, तृप्ति और अकथनीय आनंद की अनुभूति होती है। उनका चिंतन है कि जीवन सीमित है यह कहना उचित नही है। किसी का भी जीवन सीमित नही होता क्योंकि वह गतिमान एवं बहुआयामी होकर सफलता की नई दिशाओं एवं नई संभावनाओं का अवसर प्रदान करता है। मृत्यु कब, कैसे और किस स्वरूप में आ जाए, हम पता नही कर सकते है इसलिये जीवन को खूब संतुष्ट, तृप्त एवं खुश होकर भरपूर जियो। यह हमेशा संघर्षपूर्ण एवं चुनौतियों से भरपूर रहता है। मैंने जीवन में देखा है कि इंसान से ज्यादा जानवर अधिक वफादार होता है। मैंने षेर को हिरण की रक्षा करते हुए देखा है किंतु इंसान ही आज इंसान का दुश्मन बन बैठा है और स्वार्थ के आगे धर्म की भी उपेक्षा कर देता है। जीवन में जरूरतमंद की सेवा से बढकर कोई पुण्य नही है एवं मेरे लिये यही ईश्वर की पूजा है।
मेरे अनुरोध पर उन्होंने एक भावानात्मक संस्मरण बताया कि सन् 1982 में उनकी बेटी का विवाह था और बारात बंबई से आ चुकी थी। शाम को 4 बजे से अचानक मूसलाधार बरसात होने से विवाह स्थल पर आधे घंटे में ही एक फुट पानी भर चुका था, इससे सभी लोग परेशान थे कि अब क्या करें और अब आयोजन कैसे होगा ? इस विषम परिस्थिति में उनके पडोसी श्री कैलाश गुप्ता सामने आये और बोले कि विवाह उनके घर से कर लिया जाये। उनके इस कथन ने हमारे परिवार को बहुत बल दिया, यह आश्वासन मेरे लिए बहुत बडा था। मैं जीवनभर इसके लिये उनका आभारी रहूँगा। बेटी का विवाह बडी धूमधाम से संपन्न हो गया जिसका श्रेय में भगवान और अपने मित्रों को देता हूँ। यह घटना मेरे जीवन की अविस्मरणीय घटना है।
हमारे संस्कारों के पल्लवित होने में कई पीढियों का योगदान रहता है। मुझे गरीबों व अशक्तजनों की मदद करना, अपने उसूलों से समझौता नही करना, गलत बातों का कभी साथ नही देना, ईमानदारी मे विश्वास रखना आदि शिक्षायें विरासत में मिली, जिनका अनुसरण मैं निरंतर कर रहा हूँ। मैं अपने जीवन का बचा हुआ समय आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की मदद करने, उनके बच्चों की शिक्षा, बीमारी एवं विवाह में सहयोग देने में बिताना चाहता हूँ। मैं रोटरी क्लब एवं अनेक सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से गरीब महिलाओं के लिये सिलाई मशीन, गृहउद्योग, स्वरोजगार के साधन, होम्योपैथिक चिकित्सा आदि उपलब्ध कराने जैसे सेवा कार्यों में संलग्न रहता हूँ। इन कार्यों से मुझे उत्साह, ऊर्जा एवं प्रेरणा मिलती हैं। मैं अपने पारिवारिक वातावरण से पूर्ण संतुष्ट हूँ। पुनर्जन्म के विषय में काफी सुना, पढा है और इस धारणा में विश्वास रखता हूँ कि मनुष्य के कर्मों और भावनाओं के अनुसार ही उसका पुनर्जन्म होता है।