बादल रीत गए क्या सारे ।
दग्ध हृदय अब किसे पुकारे ।।
बातों का दावानल लेकर ।
निकल पड़े है हाय बेचारे ।।
शंकित मन है बुद्धि विकल है ।
अन्दर बाहर कोलाहल है ।
गंगा यमुना के संगम में ।
कौन घोलता हाय गरल है ।
पलकें मूँदे भाग रहे हैं ।
कौन जो इनके नयन उघारे ।।
रावण का हर तन पर कब्जा ।
तन ही क्या हर मन पर कब्जा ।
विश्वविजय को क्यो हो आतुर ।
लगा हुआ है अब जा तब जा ।
स्थिर बुद्धि जब होती है ।
जब नर जीवन हेतु बिचारे ।