हा , मैं एक जासूस हूँ
वक़्त की उलजनो को सुलजाने में लगा हूँ ,
अपने ही देश को बचाने में लगा हूँ ,
हा , मैं एक जासूस हूँ
दुश्मन की चाल को अपनी ही चाल में फसाता हूँ,
दिमाग के इस शतरंज को बडी सिद्दत के साथ खेलता हूँ,
हा , मैं एक जासूस हूँ
दुश्मन अपनी ही दोनों आँखों से कितना भी चौकन्ना क्यों न हो,
में हमेशा अपनी तीसरी आँख को खुली रखता हूँ
हा , मैं एक जासूस हूँ
में क्या देखता बोलता सोचता करता और दिखावा करता हूँ ,
ये मेरे अलावा मेरे खुदा भी नही जानता ,
क्योकि , जुरूरत पड़ने पर
में आँख से सुन और कान से देख भी लेता हूँ
हा , मैं एक जासूस हूँ
बलिदान देने की परंपरा को नकारता हूँ ,
बलिदान लेने की परंपरा को स्वीकारता हूँ
हा , मैं एक जासूस हूँ
क्योंकी मेरी लड़ाई तलवार की धार से ज्यादा,
दिमाग की धार पर मुकम्मल होती हे,
अस्तित्व की लड़ाई यु ही चलती रहती हे
मेरे इश्क़ और मजहब के बारे में मत पुछ ,
जासूसी मेरा इश्क़ और मिट्टी को मेरा मजहब मानता हूँ,
अपने आप को में एक जासूस मानता हूँ ||
समर्पित - देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले जासूसो को
कविता के रचनाकार:
वेद चन्द्रकांतभाई पटेल
२४,गोकुल सोसाइटी ,
कड़ी ,गुजरात
Mob.-9723989893