My New Poem...!!!
❣️*खुशियाँ कम और अरमान बहुत हैं ।*
*जिसे भी देखो परेशान बहुत है *
*करीब से देखा तो निकला रेत का घर ।*
*मगर दूर से इसकी शान बहुत है ।।*
*कहते हैं सच का कोई मुकाबला नहीं ।*
*मगर आज झूठ की पहचान बहुत है ।।*
*मुश्किल से मिलता है शहर में आदमी ।*
यूं तो कहने को इन्सान बहुत हैं
महल-से अमीरों के घर हैं अनगिनत आज।**
पर मिट्टी के वो टुटे-फ़ुटे-से घरोंमें सुकुँ बहुत...!!!❣️