गुमनाम
हे पथिक।
तुम किस पथ पर बढ रहे
जिसका ना जाने कहाँ है अंत
अपना वक्त क्यों बर्बाद कर रहे
कांटों से आच्छादित इस राह में
फूल हैं कम
पथिक ने कहा
इन कांटों से
नही है मित्रता मेरी
फिर भी ये मुझे
फूलों के समान दिख रहे
कठिनाईयों एवं परेषानियों के
इस पथ पर चलते हुए
अपनी मंजिल की ओर बढ रहा।
इसके परिवर्तन की चाह में
स्वयं को समर्पित कर रहा
ताकि तुम कभी
इस पथ पर चलो तो
तुम्हें षूल के चुभने का नही,
फूल की कोमलता का हो अहसास
विषभरे पथ पर भीे
कर सको अमृत का अहसास
हृदय में महसूस हो प्रेम का भाव
ऐसे पथ पर चलता देख
लोग समझते है पागल
पर जब वे बनते है एक दिन महान
और उन्हें ना समझने वाले
हो जाते है अंधेरो में गुमनाम।