क्या याद है तुम्हें..
मेरे दुपट्टे का छोर जो तुमने फाड़ दिया था,
बहुत ज़ल्दी में थे तुम,
और वो फंस गया था, कलाई में बंधी घड़ी में कहीं..
मैं निकाल ही रही थी सहजता से,
की तुमने एक झटके में खींच दिया..
मैं अवाक थी फटे दुपट्टे की किनारे को पकड़े..
मन दुःखी था..
और फिर तुम चले गए मगर तुमने वो छोर फेंका नहीं..
शायद तुम्हें नहीं पता, मगर मैं मुस्कुरा दी क्योंकि देख रही थी तुम्हें.. उसे रखते हुए कहीं जेब के कोने में..
सुनो..
क्या आज भी वो वहीं कहीं कोने में दबा है..
या फेंक चुके हो उसे..??
#रूपकीबातें