My New Poem ...!!!
वो मोहब्ब़त भी कितनी हसीन थी
ज़ब हम मासुम-से छोटे-से बच्चे थैं,
आज़ लडाई कल सूलेह हो ज़ाती थी
वो बचपन के रिस्ते भी कितने पक्के थैं
गुडा-गुडी छुप-म-छुपी गिल्ली दंडों के
बीच कब छौटी-सी सुलह हो जाती थी
लिंग-भावहीन हाथा-पाई हो जाती थी
मिट्टी के घरौंदों में ही शाम हो जाती थी
वक़तकी परवाह ना गुनाह का ख़याल,
धाबें पर शाम ही से पानी छँटकाव से
ठँटककी चादर पे बिस्तर की जाती थी
तारें गिनतें ही ऑाखे बंध हो जाती थी
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