My New Poem...!!!
चेहरा पढ़ कर इंसान पहचान ने कि क़ाबिलियत तो आज भी है हर बंदे में
तकलीफ तो इस बात की है कि
इंसानों ने चेहरे पे चेहरे सज़ा रखें है
ऋत भी बदलती हैं चार माह में
इन्सान तों बदलते चार पल में
अभी-अभी हाँ कहाँ एक बात पर
अगले ही पल ना कहाँ जवाब में
एक ज़बाँ पर जान न्योछावर थी
कभी,आज जान-बेजान हयात में
दौलत के मिज़ान से परखते बंदे
मरते थे कभी किरदारकी आन में
चाहत, भाईचारा, यक़ीन भी था
था अपनापन भी अड़ोसपड़ोस में
आटा दाल चीनी कटोरी की भी थी
लेन-देन आपसी प्रेम प्यार-एतबार में
बिती बात बनी यारी दोस्ती भाईचारगी
यक़ीं विश्वास भरोसा छुटा व्यवहार में
प्रभु-परस्ती भी बनी है मतलब-परस्ती
मुराद ख़रीदी चादर प्रसाद नारियल में
उपर बैठा प्रभु भी मुश्कुराएँ बंदे कि एसी मासूम बालपन-सी नादान-सी अदा में
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