देह की देहरी
क्यों निगाहें तुम्हारी
मेरे जिस्म को भेदती हैं
क्यों हमेशा मेरे बदन के
उतार चढ़ाव देखती हैं।
क्यों बार बार निगाहों से
तुम हमें बेपर्दा करते हो
क्यों हर बार निगाहों से ही
तुम मर्यादा पार करते हो।
उड़ना चाहें तो तुम
नोच लो पंख हमारे
किसने दिया अधिकार तुम्हें
कि तुम छीन लो हमारे सपने सारे।
जीवन दिया जिसने तुमकों उसके लिये
तुम अपनी सोच एक बार तो देखो
पूजा में जिसके पाँव तुम पूजते हो
फिर क्यों उसके जिस्म को तुम नोंचते हो।
तुम पुरुष हो तो
है तुम्हें गुरूर कितना
क्या स्त्री को खुल के जीने का
नहीं अधिकार भी इतना।
समझ के उसको इंसान तो देखो
देकर उसको सम्मान तो देखो
देख सको जो कभी तो तुम
देह की देहरी के पार तो देखो।
✍🏻शिल्पी सक्सेना