*बेडियां*
तोड़ दी जंजीरें मैंने
अपने पाँव की
चल रही हूँ रोब से
मुझमें कोई ऐब नहीं
लड रही हूँ शौक से
खुद को आजाद किया उस कैद से
जिस पर हुकूमत औरों की थी
कुचल दिए मैंने
पुराने बेडियोंसे रिवाज
आजाद पंछी हूँ मैं
मुझे मुझ पर नाज
मैं हूँ अपना गुरूर
मैं हूँ मुझमें मश्गूल!
-©मितवा 🖋