रूह-प्रेम (लघुकथा)
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"मैं तुम्हारे जिस्म से नहीं तुम्हारी रूह से प्रेम करता हूँ।" प्रेम ने रूही को अपने आग़ोश में समेटते हुए कहा।
कुछ पल इसी तरह गुज़र जाने के बाद रूही को घर की याद आई, "उफ़ बहुत देर हो गयी, मुझे जल्दी से घर पहुँचा दो। नहीं तो मम्मी सारा घर सिर पर उठा लेंगी। फिर मेरा घर से निकलना बंद हो जाएगा।"
प्रेम ने रूही को अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और मोटरसाइकिल सरपट दौड़ा दी। अभी कुछ ही दूर पहुँचे थे कि तेज रफ़्तार मोटरसाइकिल का संतुलन बिगड़ा और रूही कई फिट ऊपर उछलती हुई सिर के बल सड़क पर गिरी और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
महीने भर बाद प्रेम शर्मीली के साथ बाग में बैठा हुआ उससे कह रहा था, "शर्मीली मैं तुम्हारे जिस्म से नहीं तुम्हारी रूह से प्रेम करता हूँ।"
शर्मीली ने स्वयं को उसके आग़ोश में छुपा लिया। शाम को शर्मीली से विदा ले घर पहुँचा। खा-पीकर अपने कमरे में सोने चला गया। बत्ती बुझायी ही थी कि रूही की आवाज़ आयी, "प्रेम! प्रेम!! प्रेम!!!....।" (प्रेम पसीने से तरबतर घबराकर उठा, पागलों की तरह इधर-उधर देखने लगा।) "....इधर-उधर क्या देख रहे हो। मैं रूही.... तुम मेरी रूह से प्रेम करते थे। मैं भी तुम से बहुत गहरा प्रेम करती हूँ। मेरा जिस्म ख़त्म हो गया तो क्या, मेरी रूह तो जिंदा है। लो मैं आ गयी हूँ। अब जी भरकर प्रेम करेंगे।"
प्रेम बेतहाशा अपने कमरे से बाहर भागा। अब वह बावलों-सा बदहवास खोया-खोया रहने लगा। घर वाले उस पर किसी प्रेतछाया का असर समझ, उसको ले औझाओं के चक्कर लगा रहे हैं।
- विजय 'विभोर'
05/09/2019