फल (लघुकथा)
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पंडित जी अपने आँगन की दीवार के साथ लगे एक फलदार वृक्ष को काट रहे थे। महीने में कभी-कभार पंडित जी की गली से होकर एक छोटे बालक के साथ गुजरने वाले फ़क़ीरी चोले वाले बुज़ुर्ग ने पूछा, "अरे पंडित जी! यह फलदार, छायादार वृक्ष क्यों काट रहे हो?"
"अरे क्या बताऊँ, बड़े जतन से लगाया था यह पेड़। बच्चे की तरह देखभाल की है इसकी। सोचा था बड़ा होकर अच्छे फल देगा। लेकिन सब जतन करने के बाद भी एक फल के दर्शन नहीं हुए। फ़ालतू में जगह घेरे हुए है। इसको काटकर यहाँ एक दुकान निकाल दूँगा। बैठे-बिठाए कुछ किराया तो आएगा।"
"पंडित जी! तुम्हारा पढ़ा-लिखा लड़का भी तो कई वर्षों से खाली बैठा है, कोई काम-धाम नहीं करता।" अपने साथ चल रहे बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए फ़कीरी लिबास ने कहा और आगे निकल लिया।
- विजय 'विभोर'
23/06/2019