सदा अपनी ही मनमानी चलाते हो
कभी हमारी भी चलाने दो
कहेत हो की क्यू चुप हो
पर ये नहीं कहेते की कुछ तो बोलो
सदा अपनी बाते सुनाते हो
कभी मेरी भी सुन लिया करो
माना मैंने तेरी जिम्मेदारी है ज्यादा हमसे
पर हम यूहीं नहीं बैठे है घर में
तेरी आहट होती आंगन में
दूर से तेरे चहेरे की लकीरों को पढ़ लेते
कभी हमें भी पढ़ लिया करो
बस थोड़ी सी सुन लिया करो