पिता
कई-कई बार भेजी थी चिट्ठी
अपने दुख-दर्दों को छिपा,
कुशल से भरे थे पन्ने।
पार्सल से भेजा गया सामान
मनीआर्डर के रुपये,
पत्रों में लिखे गये शब्द
मेरी कुशल कहते थे।
पिता का होना
लाठी के सहारे चलना,
अँधेरी रात में खाँसना
मेरी दुविधा मिटाते थे।
उनका वरदहस्त
हमारी आयु को अशीषता था।
हमारे बीच का संवाद
आगे-पीछे का मन मुटाव,
चलता-फिरता लाड़-प्यार
वर्षों तक मिलजुल कर
धुँध को मिटाते थे।
मैंने अनुभव किया
शब्दों के परे प्यार जाता है,
रिश्तों के पास
सुख-दुख का खजाना रहता है,
मन कई - कई बार टूट कर
अपने उत्स पर टकटकी लगाता है।
*महेश रौतेला