हर शब खामोश राह से गुजरते कुछ नया कहा
नजर आता है
वही खमोशी वही सन्नाटा वही बदमिझाज जहाँ
नजर आता है
कोइ तवायफ बाजारु आवारी पुकारता
नजर आता है
उन राहो पे बिकती हुइ आबरू का तमाशा
नजर आता है
खामोश सियाह रात में पुरसुकुन नींद कहा
मयस्सर इनको
इनकी रातो में बेचैन करवटो का सिलसिला
नजर आता है
कहा है वो हिंद के जहा सीता मरयम को
पूजा जाता है
यहा तो बहनो की लुटती आबरू पे आर्कोष
नजर ना आता है
हर राहगिर को एक सजा हुआ खिलौना यहा
मिल जाता है
किसी को बे रुह बदन कफन मे ढका
नजर नही आता है
अब खामोशी इख्तियार करके कुछ नही हासिल
नवाज
उठा कलम और लिख देखेंगे ये क्या असर
लाता है
- नवाझ