सुकुन पाये तो कहा पाये
रंज-ओ-गम है संभाले हुये
लहेरो से केहदो डर नही है तुमसे
साहिल पे है समंदर छिपाये हुये
पेडो की शाख को काट दो चाहे
वो जुकते नही , तिलमिलाते हुये
ये किस्से है सभी उसके ही है
रो पडते है कहानी बताते हुये
दुरतलक आशियाना नही है
शहेर उजड गये बसाते हुये
मैं देर तक समजाता ही रहा
गला सुख गया , मनाते हुये
- "उपेन" 3/10/19