जब कभी तुझे लिखना चाहूं,
क्यूं खो जाते हैं अलफाज़ मेरे,
तू गिरफ्त में नहीं इनकी,
या तुझे बयान करना हैसियत में नहीं इनकी।
इतना मासूम और इतना सरल,
ऐसी सादगी, जैसी कह दी हो कोई गज़ल।
ये खामोशी, कितनी अनकही बातों की खनक है इसमें,
ज़माने का शोर ठहर जाए, जो बैठे दो घड़ी तेरी पहलू में।
एक तलाश में भटकते, ना जाने कहां जाकर रुकते,
कि हवा के एक झोंके में, अटक गया आंचल, देखा तो तुम थे,
ये क्या ढूंढ लाए हम तेरे होने में, गौर से देखा तो हम थे,