उठकर मैं चलता हूँ
वन्दन करने आता हूँ,
कुछ मिले,न मिले मुझे यहाँ
पर शान्ति अनुभव करता हूँ।
दूर देश तक जाता हूँ
यात्रा पूरी करता हूँ,
कुछ मिले ,न मिले इस पथ पर
पर शान्ति बहुत पाता हूँ।
शब्द ईश्वर बन जाते हैं
पूजा परिक्रमा कर लेती है,
कुछ मिले ,न मिले इस विधि में
जीजिविषा संतुष्ट हो जाती है।
पहाड़ चढ़ जाता हूँ
हिमगिरि दर्शन कर आता हूँ,
कुछ मिले ,न मिले हाथों को
शान्ति अद्भुत पाता हूँ।
प्यार की शुद्ध आत्मा में
कुछ क्षण ठहर लेता हूँ,
कुछ मिले ,न मिले इस राह में
विपुल शान्ति में उड़ लेता हूँ।
* महेश रौतेला