# मेरे शब्द मेरा संबल #
आँखों को मूँद कर
प्रेम की गिरह में उतरना
मेरे लिए खुद को ढूँढ़ निकालना था
ठीक उसी तरह
जैसे कोई चित्रकार
रंग भरते वक्त अपनी आँखों में रंग भरता हो
कोई रचनाकार अपने शब्दों में उतरता है
या कोई पा लेना चाहता हो
अपने ख्वाबों की पूरी कायनात
ले आना चाहती थी मैं
वापस अपने ही रंगों में ढले
अपने एहसासों को
इस जादुई दुनियाँ में
मैं भींच लेना चाहती थी
ममत्व से
अपने ही उस अन- अपेक्षित
मुक्त भाव स्वरूप को
जिसने सारे एहसास खुले मन से खर्च दिये थे
जिसके पास कुछ बाकी नहीं था
लिखने को या कहने को
उस समय मेरा चेहरा बुद्ध की तरह
शान्त और निर्विकार
महसूस किया मैंने
और शायद इसीलिए
मैं नहीं खोलना चाहती थी
वो पलकें जो बोझ से बंद थीं
क्यों कि उन पलकों के आगे उठते गहरे धुयें में
कोई था
जो अपनी सुनहरी कलम से
तो कभी अपनी रंग भरी कूँची से
मेरी हथेलियों पर खींच रहा था
दो समानान्तर चलतीं रेखाऐं
जहाँ एक में प्रेम था
और दूसरी में जीवन
एक जगह क्रास तो एक जगह वक्र
एक अंतिम बिन्दु पर आकर
देखा उसने
मेरी ओर मुस्कुराकर
और गायब हो गया
ये आकृति मेरा संबल थी
मेरी प्रेरणा और प्रेम
मेरे शब्द अब चमकने के लिए अब पुनः तत्पर थे
#pranjali ....