ग़ज़ल
किसी के प्यार का मारा बहुत है।
समन्दर इसलिए खारा बहुत है।।
चल अब आज उसको जीत दे दें।
वो हमसे आज तक हारा बहुत है।।
ये मेरे यार मुझसे कह रहे हैं।
हमारा यार नाकारा बहुत है।
नकाब उसने उतारा होगा शायद।
शहर में आज उजियारा बहुत है।।
न छेड़ो तुम समझकर इसको ठंडा।
जलाने को ये अंगारा बहुत है।।
रखो तुम पास अपनी नौकरी ये।
हमें तो ईंट और गारा बहुत है।।
बड़े तालाब की मछली को रावत।
जरा सा ही सही चारा बहुत है।।
रचनाकार
भरत सिंह रावत भोपाल
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