सुख
रामसुखलाल नगर के एक प्रसिद्ध कपड़ों के व्यापारी थे। उनका व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था और उनकी गिनती शहर के धनाढ्य व्यक्तियों में होती थी। वे स्वभाव से बहुत कंजूस प्रवृत्ति के थे। वे दान, धर्म और किसी की भी आर्थिक मदद करने से दूर रहते थे। उनकी सोच यह थी कि व्यक्ति गरीब या अमीर अपने कर्मों की वजह से है। एक दिन उनके यहाँ एक साधु आये जिनका उन्होंने काफी आदर सत्कार किया और अपने मन की उलझन बताते हुए कहा कि उनके पास सबकुछ है परंतु मन में शांति का अभाव है। इस कारण सब कुछ होते हुए भी जीवन में खालीपन सा लगता है।
यह सुनकर महात्मा जी ने कहा जीवन में एक बात याद रखो कि बिना सेवा के वैभव बेस्वाद है। जब वैभव में सेवा की भावना जुड़ जाती है, तो वह महक उठता है। सेवा से अहंकार मिट जाता है, आसक्ति दूर हो जाती है एवं हमारे आत्मा की ज्योति प्रकाशित होकर हमारी अंदर की आँखों को खोल देती है। तुम ध्यान रखना कि धन से सब कुछ प्राप्त नही हो सकता। आप धन से दवाईयाँ खरीद सकते है परंतु स्वास्थ्य नहीं, आलीशान पलंग खरीदा जा सकता है, परंतु नींद़ नही। इसी प्रकार धन से सुविधायें प्राप्त की जा सकती है, परंतु शांति नही।
रामसुखलाल पर इन बातों का बडा प्रभाव पडा और उन्होंने शनैः शनैः अपने स्वभाव में परिवर्तन करके सेवा और त्याग को जीवन में उतारना प्रारंभ किया। इससे उन्हें अपने स्वभाव में काफी परिवर्तन महसूस होकर आत्मीय शांति एवं जीवन की सार्थकता का अनुभव होने लगा।