मूर्तिकार
एक जंगल में पत्थर की ऊँची ऊँची पहाडियाँ थी। इन्ही पहाडियों के बीच में एक दर्शनीय स्थल था जहाँ पर प्राचीन काल में किसी मूर्तिकार द्वारा पत्थर को तराश कर बडी सुंदर प्रतिमाएँ बनाई गई थी जिनका पुरातात्विक महत्व भी था। एक दिन पत्थर के पहाड़ों ने मन ही मन में सोचा कि हमारा स्वरूप इतना विशाल है परंतु हमारी कोई पूछ परख नही होती। हमें लोग पत्थर कहकर उलाहना देते रहते है परंतु वह मूर्ति भी पत्थर की ही है जिसको देखने के लिए दूर दूर से पर्यटक आते है और प्रशंसा करते हुए चले जाते है।
पत्थरों ने अपने मन की यह व्यथा वृक्षों को बताई तो उनमें से एक बुजुर्ग वृक्ष ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि पत्थर की पूजा तब तक नही होती जब तक उसे तराश कर मूर्ति का स्वरूप ना दे दिया जाए। इसके बाद ही उसे भगवान का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। इसी प्रकार मानव को भी अपने विशाल जीवन में गुरू रूपी मूर्तिकार की आवश्यकता होती है जो कि अपने ज्ञान के द्वारा हमारे जीवन को सुंदर और संस्कारित करते हुए अमूल्य बना देता है।