"बेटी"
बेटी माता पिता के कुल की रखें लाज,
बेटी बेटों से बढकर हैं आज ।
ये कैसे रीत रिवाज की है दुहाई ?
कि बेटी बना दी जाती हैं पराई ।
बेटी बेटों से बढकर हैं आज......।।
बचपन बीता ली जवानी ने अंगडाई,
के बजने लगी विदाई की शहनाई,
ये कौनसी रश्मे हैं ?कौन सी कश्मे हैं ?
जो बेटी को अपने ही धर मे कर देती हैं पराई ।
बेटी बेटों से बढकर हैं आज ।।
माता पिता के हृदय की वीणा के तार हैं बेटी,
पियर के साम्राज्य की सरोकार हैं बेटी,
ये कैसी परंपरा की हैं दुहाई ?
जो बेटी को पलभर मे कर देती हैं पराई ।
बेटी बेटों से बढकर हैं ।।
दो से कुलों को निभाती हैं, सजाती, संवारती हैं,
अपना सुख-दुःख सबकुछ सह जाती हैं,
अपना उपकार न किसी पर कभी जताती हैं,
ये कैसी स्नेह सरिता हैं ?
जो बिना शोर किए बही जाती हैं।
ये कैसी रीति-नीति की दुहाई हैं ?
जो बेटी को बना देती हैं पराई ,
ये जमाना ! तुझे खुदा की खुदाई की कसम ,
अब न कोई बेटी हो पराई ,
क्योंकि आज बेटी हैं बेटों से बढकर ।
बेटी हैं बेटों से बेहतर । ।।जय हो बेटी ।।"गीता"