कही अनकही बातें वो गुजरी हजार रातें,
वक्त वेवक्त जगाती सोयी चुप जज्वातें।
यादों में डूबी जब भी सामने आते अब भी,
खुश नहीं थी तब भी खुश नहीं मैं अब भी।
चारों तरफ हैं काँटे सुख दुख किससे बाँटें,
दूरी भली नहीं अब आप खूब मुझको डाँटें।
मैं सदा रही समर्पित दिन रात तुममें अर्पित,
पर तुम ही रहे भटकते दे दी तलाक घृणित।
अब भी नहीं मैं भूली जैसी नफरत मैंने झेली,
हाँ, विरोध मैंने की थी पर तलाक तूने दे दी।
कही अनकही बातें वो गुजरी हजार रातें,
वक्त वेवक्त जगाती सोयी चुप जज्वातें।
✍?मुक्तेश्वर मुकेश